expr:content='data:blog.isMobile ? "width=device-width,initial-scale=1.0,minimum-scale=1.0,maximum-scale=1.0" : "width=1100"' name='viewport'/> Rasaddhayan- For Students: रसायन शास्त्र हिंदी माध्यम के लिए || Chemistry topics in Hindi
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Thursday, March 18, 2021

ous&ic

आज का विषय हैं -ous और -ic के बारें  में । आपने केमिस्ट्री में कुछ शब्दों को हमेशा सुना होगा जैसे नइट्रिक नाइट्रस, ferric, ferrous, cupric, cuprous, सल्फ्यूरिक , सल्फुरस | लेकिन प्रश्न ये  उठता हैं की आख़िर यें हैं क्या ?

शुरू में ये नामकरण  सिस्टम धातुओं के लिए था, ऐसे धातु जो exactly दो ऑक्सीकरण अवास्था दर्शाते हो हो, और उनके नाम की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई हो,

जैसे कॉपर, आयरन, टिन, लेड, इत्यादि | इनके अनुसार जब धातु अपने अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था में हो तो उनके नाम के साथ -ic लगते हैं और जब उनमे ऑक्सीजन की कमी हो तो उनके नाम के साथ -ous लगते है | जैसे कॉपर की सामान्यतः दो ऑक्सीकरण अवस्था होती हैं +2 aur +1. Ferrum जिसे आयरन भी कहते है उसकी ऑक्सिकरण अवस्था  +3 और +2, Stannum जिसे टीन कहते है उसकी ऑक्सिकरण अवस्था +4 और +2, तथा plumbum जिसे लेड कहते है उसकी ऑक्सीकरण अवस्था +4 और +2 होती है  |

अतः यहाँ जब कॉपर  +2 ऑक्सीकरण अवस्था में होता हैं तो उसके नाम के साथ -ic लगता है जैसे cupric तथा  + ऑक्सीकरण अवस्था में होता हैं तो उसके नाम के साथ ous लगता है जैसे cuprous । उसी प्रकार जब आयरन   ३ में हो तो  उसे ferric तथा  +2 में हो तो  उसे फेरस कहते हैं । आयरन को ferrum कहते है उसी से ferric और ferrous टर्म आये हैं । इसी तरह टिन के लिए स्टैनिक और stannous तथा लेड के लिए प्लम्बिक और plumbous शब्दों का प्रयोग करते हैं ।

उदाहरण के लिये cuprous क्लोराइड, ferric oxide , और mercuric chloride Cuprous में कॉपर की ऑक्सीकरण संख्या   + , ferric में  + तथा मरक्यूरिक में  + होती है। मरकरी  + तथा  + ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता हैं

ऑक्सीजन के सन्दर्भ में एसिड्स और oxides के साथ भी -ous और -ic लगते है। इसीलिए सल्फुरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड टर्म होता है।।लेकिन सल्फुरिक क्लोराइड या नाइट्रिक क्लोराइड जैसा कोई शब्द नहीं होता। नाइट्रस ऑक्साइड होता है  लेकिन नाइट्रस क्लोराइड नहीं होता नियम यहाँ भी वही कि अगर कोई तत्व अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था में है तो पस्च्लग्न यानि सफिक्स –ic लगेगा  और अगर एक ऑक्सीजन कम है तो –ous लगेगा।

 

 

Thursday, October 8, 2020

Periodic table || आवर्त सारणी हिंदी में || Explanation थोड़ा हट के

Note: इस Blog में Peridoic table या आवर्त सारणी क्या है इसको हम आसान भाषा में समझने का प्रयास करेंगे । ये वीडियो हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को ध्यान में रख के बनाया गया है | इसमें पीरियाडिक टेबल को एक आम आदमी की भाषा में समझने का प्रयास किया गया है |

 

नमस्कार दोस्तों, आज हम बात करेंगे पीरियाडिक टेबल या आवर्त सरणी की। इसमें सबसे पहले बात कर लेते है मेंडलीव के पीरियाडिक टेबल की। 1869 (१८६९) में एक Russian केमिस्ट Dimitri Mendeleev ने एक पीरियाडिक टेबल का प्रतिपादन किया जिसमे कुल ६० तत्त्व (Elements) थे, जिसे इन्होने "Zeitschrift fϋr Chemie" नामक पत्रिका में प्रकशित किया। मेंडलीव ने आवर्त सरणी में एलिमेंट्स का अरेंजमेंट उसी प्रकार से किया जैसे हम किसी बटखरे को उसके भार के हिसाब से अर्रंगे करते है। अर्थात तत्वों को उनके परमाणु भार (atomic mass) के बढ़ते हुए क्रम के हिसाब से उनका अरेंजमेंट किया। अब एक प्रश्न उठता है की पीरियाडिक टेबल होता क्या है। तो इसे पीरियाडिक इसीलिए कहते है क्यूंकि आवर्त सरणी में एक निश्चित अंतराल के बाद आने वाले तत्व उसी ग्रुप में मौजूद अपने से पहले उपस्थित तत्वों के गुणों से समानता रखते है। जैसे पोटैशियम और सोडियम, इन् दोनों के आधार भूत गुण सामान होते है, इसीलिए इन्हे एक हे ग्रुप में रखा गया है।

अब हम बात कर लेते है मॉडर्न पीरियाडिक टेबल या आधुनिक आवर्त सारणी की। मॉडर्न पीरियाडिक टेबल को हम एक स्टेडियम के उदाहरण से समझेंगे। अर्थात हाइड्रोजन और हीलियम को सबसे नीचे और बाकी एलिमेंट्स को ऊपर की तरफ रखेंगे। अब मान लीजिये पीरियाडिक टेबल एक स्टेडियम की तरह है जहा हाइड्रोजन और हीलियम सबसे नीचे की सीढ़ियों या ग्राउंड फ्लोर पे बैठे हैं। लिथियम से लेके नीयन तक के एलिमेंट्स उनके ऊपर वाले फर्स्ट फ्लोर पे बैठे है तथा सोडियम से लेके आर्गन तक के एलिमेंट्स उनके भी ऊपर सेकंड फ्लोर पे बैठे है। तो हाइड्रोजन (Hydrogen) से हीलियम (Helium), लिथियम (Lithium) से नीयन (Neon), तथा सोडियम (Sodium) से आर्गन (Argon) तक के हॉरिजॉन्टल सफर को हम रौ या पीरियड कहेंगे।  इसके अलावा हाइड्रोजन से सोडियम तक के वर्टीकल सफर को ग्रुप कहेंगे। 

 

 

अब हम इसको ऐसे समझ लेते है की जैसे स्टेडियम में फर्स्ट फ्लोर की परिधि ग्राउंड फ्लोर से ज्यादा होती है तथा सेकंड फ्लोर की परिधि फर्स्ट से ज्यादा होती है तो हम बस अपने समझने के लिए ये मान लेते है की जैसे जैसे हम ग्राउंड फ्लोर से ऊपर के फ्लोर की तरफ बढ़ेंगे उसमे बैठने वाले लोगो की संख्या भी बढ़ेगी। अर्थात ग्रुप में हम जब हम निचे से ऊपर की तरफ बढ़ेंगे अर्थात हाइड्रोजन से पोटैशियम या फ्रैनशियम की तरफ बढ़ेंगे तो  उनमे प्रोटॉनों की संख्या भी बढ़ेगी। और चूँकि हम जानते है की जैसे किसी तत्त्व में उसके प्रोटॉनों की संख्या उसके एटॉमिक नंबर या परमाणु क्रमांक के बराबर होती है, उसी तरह मॉडर्न पीरियाडिक टेबल में भी तत्वों की उपस्थिति उनके एटॉमिक नंबर या परमाणु क्रमांक के बढ़ते हुए क्रम में ही होती है। 

 

कृप्या इन्हे डिटेल्स में जानने के लिए ऊपर दिए गए वीडियो को जरूर देखे, धन्यवाद।

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